जीवन अनमोल इसके इसको न समझें कोई खेल

सोनभद्र. जीवन में जल्द से जल्द सब कुछ हासिल कर लेने की तमन्ना और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में आज लोग बेवजह मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं. इसमें जरा सी नाकामयाबी अखरने लगती है और लोग अपनी जिन्दगी तक को दांव पर लगा देते हैं. कोरोना काल में भी लाक डाउन के चलते तमाम लोगों की नौकरियां चलीं गयीं, लोगों को अपनी रोजी-रोजगार छोड़कर वापस गाँव लौटना पड़ा, लोग शुरू में इसे लेकर तनाव में थे लेकिन अपनों के बीच बैठकर जब समस्या रखी तो उसका कोई न कोई रास्ता जरूर निकला. इसलिए जब भी हताशा-निराशा में कोई भी गलत कदम उठाने की बात दिमाग में आये तो सबसे पहले अपनों के करीब जाएँ. इन्हीं मामलों को देखते हुए हर साल 10 सितम्बर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है.

विश्व आत्म हत्या मनाने का मकसद आत्महत्या को रोकने के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करना है. इसके जरिये यह सन्देश देने की कोशिश की जाती है कि आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है. इस वर्ष विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस की थीम है- “आत्महत्या रोकने को मिलकर काम करना ” कोरोना काल में ऐसी कई खबरें आयीं कि कोरोना उपचाराधीन के डर के कारण आत्महत्या कर ली , इसमें पढ़े लिखे लोग भी शामिल थे. कुछ लोगों ने आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या कर ली. आत्महत्या का सीधा जुडाव मानसिक स्वास्थ्य से है. इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर सुसाइड प्रिवेंशन के अनुसार विश्व में आठ लाख लोग हर साल आत्महत्या करते हैं , यानि हर 40 सेकेंड में एक व्यक्ति की मृत्यु आत्महत्या से होती है. नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में आत्महत्या की दर 2.4 प्रति लाख जनसंख्या है मतलब यह है कि एक लाख की आबादी पर लगभग दो लोग आत्महत्या करते हैं वहीं राष्ट्रीय दर 10.4 प्रति लाख है.

इस संबंध में मनोरोग विशेषज्ञ व सोशल वर्कर सौरभ कुमार ने बताया, की यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से हीन भावना से ग्रस्त है अथवा आत्महत्या करने की सोच रहा है तो वह एक मानसिक बीमारी से ग्रस्त है. मानसिक अस्वस्थता के कारण ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो सकती है , उचित परामर्श और चिकित्सा पद्धति व काउंसलिंग के माध्यम से इसका उपचार किया जा सकता है. आज कोरोना के दौर में आत्महत्या की जो ख़बरें मीडिया में आई हैं वह इस बात की और इशारा करती हैं कि लोगों में इस बीमारी के प्रति डर बहुत अधिक है तथा बहुत से लोग आर्थिक असुरक्षा से ग्रसित हैं. इसमें मीडिया का अहम् रोल है मीडिया आत्महत्या के स्थान का विवरण न दे और वह आत्महत्या के मामलों की ख़बरों में सनसनीखेज सुर्खियाँ का उपयोग न करे, व ऐसी भाषा का उपयोग न करें जो आत्महत्या को सनसनीखेज़ या असामान्य करती हैं, या इसे समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है. आत्महत्या के लिए उपयोग की गई विधि के वर्णन या आत्महत्या के प्रयास में प्रयुक्त विधि का विवरण समाचार में न करे. सौरभ कुमार का कहना है जब व्यक्ति अवसादग्रस्त या तनाव में होता हैं तो वह चीजों को वर्तमान क्षण के परिप्रेक्ष्य में देखता है. एक सप्ताह अथवा एक माह के बाद यही चीजें भिन्न रूप में दिखाई देने लगती हैं, जो आत्महत्या करने के बारे में सोचते है, वह मरना नहीं चाहते बल्कि केवल अपनी पीड़ा को मारना चाहते हैं, ऐसे में उन्हें अकेले उस स्थिति का सामना करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए अपने परिवार के किसी सदस्य या मित्र अथवा किसी सहयोगी से बात भर कर लेने पर उसका समाधान मिल सकता है और जीवन को बचाया जा सकता है.

क्या करें यदि मन में ऐसे विचार आते हों?

जीवनशैली में बदलाव लाएं, ख़ुद पर ध्यान देना शुरू करें, खानपान को संतुलित करें, नियमित रूप से कुछ समय व्यायाम या योग करते हुए बिताएं. नकारात्मक सोच को बाहर का रास्ता दिखाएं। सबसे महत्वपूर्ण बात अकेले न रहें, परिवार और दोस्तों के संग रहें, सकारात्मक होकर कार्य करे. याद रखें, हर एक ज़िंदगी महत्वपूर्ण है इसे भरपूर जियें और तनाव से दूर रहें.

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